वो कलियां

वो कलियां

(प्रस्तुति द्वारा : नवीन निश्चल)

ये कविता उन लड़कियों के लिए जिनके साथ जो होता है और जो होता आ रहा है। जिनको आज तक सिर्फ एक कटपुतली माना गया है, जिससे जैसे चाहो वैसे नचालो। क्या कभी सोचा है कैसा मेहेसूस करती हैं वो जब उनसे उनके जिस्म को रौंदा जाता हैं । इस बेहभाव वाले युग में जब उन्हें हर कदम पर नीचे दिखाया जाता है। उनकी इच्छाओं को पैरों टेल कुचला जाता है। जिनकी आवाज़ को दबाया जाता है। यह कविता उन कलियों (सुन्दर कलियां ) के लिए जिनको सुंदरता से संजोया जाता है और इसी सुंदरता के कारण रौंदा जाता है। ये कविता उन्हीं के लिए हैं, उनकी आवाज़ के लिए हैं,उनके साथ के लिए हैं।

वो कलियां

 

वो कलियां हैं किसी फूल की तरह,

उनको ना तोड़ो किसी हैवान कि तरह,

छोड़ दो उनको उनकी तरह

 

रात को जब वो निकलती,

रहता दर यहीं हमेशा,

कहीं जाए वो परिंदा,

जो रौंद दें उनके हृदय को अकेला

 

इंसाफ के कड़घरे में वो लाए गए कभी नहीं,

मिले नहीं या,

आज़ाद हैं,

बता पाया कोई नहीं

 

फिर से कुचली जाएंगी,

फूल की कलियां यहीं कहीं,

क्या कोई ना रोक पाएगा उनको कभी ?

 

आओ मिलाएं इंसाफ को,

उनकी रूह से ज़रा,

कुछ करे इंसानियत के लिए हम ज़रा

 

आओ मिलाएं उन हैवानों को,

उनकी सज़ा से ज़रा,

कुछ करे इंसानियत के लिए हम ज़रा

आओ कुछ करे इंसानियत के लिए हम ज़रा

 

11 thoughts on “वो कलियां

  1. Chhaya says:

    So much truth in your wonderful, touching words
    I keep coming back to this poem…
    Thank you for such a great poem.

    Reply
  2. Chhaya says:

    So much truth in your wonderful, touching words,
    I keep coming back to this poem.
    Thank you for such a great poem.

    Reply
  3. Chhaya oberoi says:

    So much truth in your wonderful, touching words,
    I keep coming back to this poem..
    Thank you for such a great poem

    Reply
  4. Chhaya oberoi says:

    So much truth in your wonderful, touching words,
    I keep coming back to this poem..
    Thank you for sharing such a great words.

    Reply

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